सूचना प्रौद्योगिकी सेक्टर में रोज़गार के अवसर : किसके लिए ? श्वेता
अक्टूबर 17, 2008 नौभास द्वारा
आजकल ज्ञान अर्थव्यवस्था(नोलेज इकनोमी बूम)में आ रही ”तेजी” का खूब राग गाया जा रहा है. बहुत ही ज्यादा हो-हल्ले और हर्शोल्ल्लास के साथ इस बात का ऐलान किया जाता है की सूचना प्रोद्योगिकी क्षेत्र(आई. टी.)में लगातार रोजगार के नए-नए अवसर पैदा हो रहे हैं. यही नहीं बेरोजगारी के लगातार कम होने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं. केवल सरकार ही नहीं बल्कि दो कौडी के बाजारू अखबार व पत्रिकाएं भी लोगों के सामने भ्रामक ”गुलाबी” तस्वीर पेश कर रहीं हैं.
आइये जरा देखा जाए कि सरकार के इन बड़े-बड़े दावों में कितनी सच्चाई है! बंगलूर को सूचना प्रौद्योगिकी का केन्द्र माना जाता है. अभी हाल ही में यहाँ किए गए नमूना सर्वेक्षण के जारी कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन पर गौर करना दिलचस्प होगा. अक्सर ऐसा कहा जाता है कि सूचना-प्रौद्योगिकी समाज के एक व्यापक हिस्से को रोज़गार दिला पाने में सक्षम है. इस सर्वेक्षण से यह बात सामने आ गई है कि अक्सर जिन रोजगारों के बूते नोलेज इकनोमी बूम का साज़ छेडा गया है वह रोज़गार इस देश के कितने नौजवानों को नसीब हो पा रहा है.
समाज में शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच का मतभेद अत्यन्त गहरा है. शारीरिक श्रम के प्रति घृणा का भाव और उसे कम करके आंकने की हमारी मानसिकता बहुत लंबे समय से हमारे दिलो-दिमाग में रचे-बसे हैं. इसलिए हम लोगों का झुकाव प्राय: ऐसे कामों की तरफ़ होता है जिनमें मानसिक पहलू ज्यादा होता है. यही कारण है कि सूचना प्रौद्योगिकी में पैदा हो रहे रोजगारों से हमें उम्मीद बनती दिखाई देती है. इसलिए आम घरों से आए छात्र-छात्राएं भी इन रोजगारों में अपनी जगह बना पाए, इसके लिए वे हर मुमकिन कोशिश में जुट जाते हैं.
सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र के भीतर भी वर्ग पदानुक्रम प्रत्यक्ष रूप में देखने को मिलता है. यहाँ भी अलग-अलग पदों के लिए लोग नियुक्त किए जाते हैं (जैसे कि एग्जीक्यूटिव, मैनेज़र, एसोसिएट्स, इंजिनियर, चपरासी आदि). कामों में किया गया यह विभाजन किसी भी व्यक्ति विशेष की शैक्षणिक पृष्ठभूमि ( जो कि असल में उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से जुडी होती है) के आधार पर तय किया जाता है. खैर, यह चर्चा एक अलग लेख की मांग करता है जिसपर किसी और दिन तफसील से बात की जा सकती है. फिलहाल हम मुद्दे पर वापस आते हैं.
इस नमूना सर्वेक्षण के दौरान पता चला के सर्वेक्षण के तहत आए कुल सॉफ्टवेयर पेशेवर (सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल) में से अस्सी प्रतिशत के पिता ग्रेजुएट हैं. इन कम्पनियों में काम कर रहे लोगों में केवल २.२ फीसदी ऐसे थे जिनके पिता कि शिक्षा बारहवीं या उससे कम थी. छप्पन फीसदी की माताएं या तो ग्रेजुएट थीं या उससे भी अधिक शिक्षित थीं. इससे साफ़ मालूम होता है की सूचना प्रौद्योगिकी की कम्पनियों में ज्यादातर वे लोग ही अपनी जगह बना पते हैं जिनके परिवार जनों ने अच्छी शिक्षा प्राप्त की है. इनमें चौरासी फीसदी के पिता ऐसे व्यवसायों में लगे थे जिन्हें उच्च मध्यमवर्गीय व्यवसायों की श्रेणी में गिना जाता है. इक्कीस फीसदी और दस फीसदी के पिता पब्लिक व प्राइवेट सेक्टर की कम्पनियों में क्रमश: मैनेज़र और एक्जीक्यूटिव के पद पर काम कर रहे थे, अठारह फीसदी के पिता या तो डॉक्टर या फ़िर प्रोफेसरी जैसे पेशों से सम्बन्ध रखते थे, तेरह फीसदी के पिता व्यापर जगत से जुड़े थे. इनमें से केवल नौ फीसदी के पिता छोटे दर्जे के व्यवसायों से जुड़े थे और तीन फीसदी के पिता खेतीबाड़ी का काम कर रहे थे. इससे एक बात स्पष्ट होती है कि सूचना प्रौद्योगिकी में काम करने वाली अधिकतम आबादी खाते-पीते मध्यमवर्गीय परिवारों से आती है जिनका जीवन सुविधा संपन्न होता है और जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के बारे में उन्हें कोई चिंता नहीं होती है.
सर्वेक्षण के अन्य पहलुओं पर अगर एक सरसरी नज़र दौड़ाई जाए तो समझ में आता है कि सूचना प्रौद्योगिकी में काम करने वाले लोग जिनका अध्ययन किया गया है उसमें से 36 फ़ीसदी का जन्म दूसरे दर्जे के शहरों में हुआ; 29 फ़ीसदी का जन्म किसी न किसी मेट्रो शहर में हुआ है (जैसे मैसूर और पुणे) और 31 फ़ीसदी का जन्म तीसरे दर्जे के शहरों में हुआ था, कम्पनियों में काम करने वाले लोगों में से 5 फ़ीसदी ईसाई हैं, 2 फ़ीसदी हिस्सा मुसलमानों का है. इस परिघटना को भी वर्ग दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत है क्योंकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अल्पसंख्यकों का अधिकतम हिस्सा गरीबी और बदहाली से गुज़र कर रहा है और अल्पसंख्यकों का जो छोटा-सा हिस्सा ऐसी कंपनियों में नौकरी पाने में समक्ष है, वह खाते-पीते घरों से आता है.
वैसे तो इस पूरी परिघटना को व्यापक परिपेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है क्योकि इन कंपनियों में जो लोग जगह बनाते हैं वे मुख्यत: इंजीनियरिंग छात्र-छात्राएं होते हैं. और यह बात किसी से छुपी नहीं है कि इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिला पाने वाले छात्र मुख्यत: उच्च मध्यवर्गीय प्रष्ठभूमि से आते हैं जिनके परिवारजनों के पास इतने आर्थिक संसाधन होते हैं कि वे अपने बच्चों को उच्च और महँगी शिक्षा दिला पाएं. ज्यादातर कालेजों की सालाना फीस 40,000 से 50,000 रुपये के बीच होती है. यही नहीं, इन कालेजों में दाखिले के लिए जो प्रवेश परीक्षा होती है, उसकी तैयारी कराने के लिए तरह-तरह के कोचिंग सेंटर आज मैदान में उतरकर छत्रों को लुभाने में जुटे हुए हैं. इन कोचिंग सेंटरों की फीस भी कुछ कम नहीं होती, (सालाना तकरीबन 20,000 रुपये). ऐसे हालात में क्या आम घर से आए हुए छात्रों के लिए इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिला पाना मुमकिन है? इसलिए एक बहुत बड़ी आबादी तो पहले ही इन कालेजों में पहुँचने में असमर्थ है. वे पहले ही अपनी सामाजिक-आर्थिक प्रष्ठभूमि की वजह से दरकिनार कर दिए जाते हैं. इसके बावजूद आम घरों से आने वाली एक छोटी सी आबादी जो किसी तरह से इन कालेजों तक अपनी पहुँच बनाती है, उसे भी देर-सवेर इन कंपनियों से दूर खदेड़ दिया जाता है. इन कंपनियों में भरती की प्रक्रिया को अत्यन्त जटिल बना दिया गया है ताकि साधारण प्रष्ठभूमि के छात्र वहां तक न पहुँच पाएं!
आइए ज़रा एक बार सॉफ्टवेयर कम्पनियों में भर्ती (कैम्पस पैलेसमेंट) की प्रक्रिया पर नज़र डाल ली जाए. ज्यादातर आई.टी.कंपनियों केवल देश के बेहतरीन माने जाने वाले कालेजों में ही जाती हैं (जिन्हें रैंकों के आधार पर बांटा गया है). अब ख़ुद सोचिये की ऐसे कालेजों में पढ़ने वाले छात्र कौन से होते हैं? केवल वहीं विधार्थी कैम्पस प्लेसमेंट में हिस्सा ले सकते हैं जो कंपनियों द्वारा निर्धारित की हुई न्यूनतम मानक (साधारणत: कोर्स के दौरान 70 फीसदी अंक) को पूरा कर पाते हैं. यह शर्त निम्न जाती, ग्रामीण एवं कामकाजी परिवारों के छात्रों को बाहर कर देती है क्योंकि उनकी शिक्षा ज्यादातर सरकारी या फ़िर देसी स्कूलों में होती है. और इन स्कूलों में शिक्षा का स्तर कैसा होता है, इसे बताने की ज़रूरत नहीं है. आम परिवारों के छात्रों के पास इतने आर्थिक साधन ही नहीं होते कि वे “अच्छे” कहे जाने वाले स्कूलों में दाखिला ले पायें और महँगी फीस जमा करवा पाएं. नतीज़तन, होता यह है कि वे अच्छे अंक ला पाने में असमर्थ रहते हैं. खैर, इन सबके बावजूद जो थोड़े-बहुत छात्र किसी तरह से कालजों में दाखिले के बाद अच्छे अंक ला पाते हैं, और प्लेसमेंट प्रक्रिया के पहले पायदान पर कदम रख देते हैं, उनकी छंटनी तो सामूहिक चर्चा (ग्रुप डिस्कशन) और इंटरव्यू के दौरान हो जाती हैं. सामूहिक चर्चा से कंपनियों इस बात का अंदाजा लगाती हैं कि आपकी संप्रेषण क्षमता (कम्युनिकेशन स्किल्स) कितनी बेहतर है, कि आपका व्यक्तित्व उनकी कंपनी की “संस्कृति” में जगह बनाने लायक है या नहीं. इसके पश्चात् इंटरव्यू की प्रक्रिया को चरणों में बान्टा गया है– एक तकनीकी (टेक्नीकल) इंटरव्यू और दूसरा एच. आर. (ह्युमन रिसोर्स) इंटरव्यू. एच.आर. इंटरव्यू में यह देखा जाता है कि आपकी अंग्रेज़ी पर पकड़ कैसी है, और गलती से अगर अंग्रेज़ी बोल पाने में आपको थोडी दिक्कत का सामना करना पड़ता है तो समझ लीजिए कि इन कंपनियों में आपके लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि आपका अंग्रेज़ी न बोल पाना कंपनी के लिए “अपमान” का कारण बन सकता है. जाहिरा तौर पर अपनी पिछड़ी और गरीब प्रष्ठभूमि की वजह से छात्रों का थोड़ा-सा हिस्सा किसी तरह से अपनी पैठ बनने की कोशिश में लगा रहता है, वह भी पीछे धकेल दिया जाता है.
कभी-कभी निश्चित तौर पर ऐसे भी अपवाद होते हैं जो अपनी गरीब प्रष्ठभूमि के बावजूद उच्च शिक्षा संस्थानों तक अपनी पहुँच बना पाते हैं , पर इन अपवादों की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है. गौरतलब बात यह है कि नौजवानों का केवल 7 प्रतिशत हिस्सा ही उच्च शिक्षा पाने की हैसियत रखता है. इनमें से केवल 0.1 प्रतिशत या 0.2 लोग ऐसे हैं जो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नौकरी पाते हैं और रोज़गार पाने वाली इतनी छोटी आबादी के बूते ज्ञान अर्थव्यवस्था में आ रही तेज़ी की बड़ी-बड़ी हवाई बातें की जा रही हैं.
असल में ज़मीनी हकीकत तो यह है कि इस व्यवस्था का मकसद सब को रोज़गार देना है ही नहीं. इसलिए शिक्षा को लगातार महंगा किया जा रहा है ताकि एक व्यापक हिस्से पहले ही कालेजों में आने से रोका जाए. यूँ तो अर्थव्यवस्था के बढ़ते वृद्धि दर का भोंपू लगातार बजाय जा रहा है पर अब तो सरकार भी बड़ी बेशर्मी से यह कहती है जो विकास हो रहा है “रोजगारविहीन विकास” है. अब यह सरकार के ज़िम्मेदारी नहीं है कि वह सबको रोज़गार मुहैया कराए. इसलिए जल्द से जल्द इस बात को समझने की ज़रूरत है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिला हो पाने के बावजूद आम-घरों के लड़के-लड़कियों को रोज़गार मिलने की गारंटी नहीं है. क्योंकि ये रोज़गार के अवसर उस “कुलीन” मध्यम वर्ग के लिए हैं जिनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है. वैसे भी पूंजीवादी व्यवस्था में तो हर चीज़ माल की तरह बेचीं जाती है, इसलिए शिक्षा भी माल का रूप अपना लेती है–यानि जिसकी औकात हो, वो आकर ख़रीदे उसे! और जो खरीद नहीं सकता वह जिंदगी भर सड़कों पर चप्पले फटकाता फिरे! इसलिए साधारण परिवेश से आए छात्र जो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना सुरक्षित भविष्य तलाश रहे हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि इस क्षेत्र में बढ़ते रोज़गार का जो धूम्रावरण खड़ा किया गया है, उसे हटाकर सच्चाई पहचानने की कोशिश करें.
–आह्वान जनवरी-मार्च २००८ से साभार .
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Posted in Uncategorized | 4s टिप्पणियाँ
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eye opener
agreed the issue u raise
regards
sat vachan..
very true, government is just talking about development not talking it seriously. if education is for high fee payer then how a farmer’s son can be engineer, doctor, etc.
बहुत बढिया जानकारी आपने दी है।
दीपक भारतदीप