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तरुण लेखकों के नाम पत्र(1939)

अलेक्सेई तोल्स्तोय

हममें से हरेक जब अच्छा लिखने लगता है, तो जो चाहता है लिखता है. मुझे यह जोर देकर कहना चाहिए. कलाकृति का जन्म कुछ सृष्टि करने, लिखने की प्रेरणा से होता है, और केवल इसलिए नहीं होता कि आदमी सोचता है कि उसे कुछ लिखना चाहिए. कलात्मक अंतःप्रेरणा और वैज्ञानिक प्रेरणा में यही अन्तर होता है. विज्ञान-बोध, अनुभव, अनुभवों का योगफल है: यह विचार है, अन्वेशण है. कला व्यक्तिगत जीवन का अनुभव है, जिसे प्रतिमाओं में, संवेदनाओं में कहा गया हो. वह व्यक्तिगत अनुभव है जो सामान्यीकरण बनने का प्रयत्न करता है.

हममें से हरेक को अनुभव से मालूम है कि लिखना एक प्रक्रिया है जिसमें आप अपनी समग्री को वश में करते हैं, और ऐसा करने में स्वयं अपने आप को भी वश में करते हैं.

लिखने की प्रक्रिया में हमेशा बाधाएं उपस्थित होती हैं जिन्हें पार करना होता है. हमेशा कोई न कोई कठिनाई होती है जिसे दूर करना होता है. किसी को भी यह नहीं अनुभव हुआ कि लिखना आसानी से आ गया हो, कि कलम की नोक से “धारा फूटी” हो. लिखना हमेशा कठिन होता है, और जितना कठिन होता है उतना ही अंत में अच्छा होता है.

इन कठिनाइयों पर विजय कैसे पायी जाए? केवल एक ही बात विश्वास के साथ कही जा सकती है. किसी कलात्मक समस्या के जितने सम्भव समाधान हों, उनमें से आपको वही चुनना चाहिये, जो आपके लिए सबसे अधिक दिलचस्प हो, जिसमें आपके लिए सबसे अधिक आकर्षण हो.

दूसरे शब्दों में आपको प्रत्येक कलात्मक स्थिति को अपनी व्यक्तिगत नापसंदगी से मिलाकर देखना चाहिए. क्या आपको यह लिखने में कोई आपत्ति है या नहीं है? अगर आपत्ति है, या आप अगर इससे उकता चुके हैं तो मत लिखिए. नतीजा ख़राब और झूठा होगा लिखिए तभी जब आप लिखना चाहें जब आपको इसमे आनंद आए. मैं यह इसलिए कह रहा हूँ कि तरुण और अनुभवहीन लेखक किसी कृति की सृष्टि में इन कठिनाइयों से घृणा के साथ, बिना उत्साह के जूझते रहते हैं. आपको इन बाधाओं को उकताहट की हालत में नहीं लांघना चाहिये, आपको अपने पर फैलाने चाहियें और उड़ना चाहिये.

इसे पृष्ठ पर सबसे ऊपर लिखिये: कला प्रतिमाओं के सृजन की वह प्रिक्रिया है जब कलाकार को स्वयं सृजन में दिलचस्पी होती है, असाधारण दिलचस्पी होती है, उससे भी ज्यादा जितनी पाठक को पढने में होती है. यह भी होता है कि लेखक उत्साह के साथ लिखता है और पाठक इसे बिना उत्साह के पढता है. इसका मतलब केवल यह है कि लेखक को अपनी बात कहने का अनुभव नहीं है, मगर उसका रास्ता ठीक है.

कला, विज्ञान की तरह, जीवन का संज्ञान है. विज्ञान अनुभव के जरिये( वैज्ञानिक के विचार की रौशनी में) सत्य का बोध कराता है. जितना अधिक अनुभव होगा, जितने अधिक तथ्य होंगे, उतना ही अधिक सही परिणाम निकलेगा. यदि किसी वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अनगिनत संख्या में परखे और जांचे हुए तथ्य इकट्ठा कर लिए जाएँ तो जो परिणाम निकाला जाएगा वह परम सत्य के निकट होगा.

अपने सामान्यीकरण के लिए कला अनुभवों की संख्या पर निर्भर नहीं करती. कला का उद्देश्य लाक्षणिक तथ्य है…आप किसी व्यक्ति से मिलते हैं, बातें करते हैं और आपको महसूस होता है कि आप उस व्यक्ति का उसके युग के प्रतिरूप की सृष्टि करने में प्रयोग कर सकते हैं. क्या इस तरह की बात सम्भव है? हाँ है.

कला, मैं फ़िर दोहराऊँ, (विज्ञान की तुलना में) सीमित अनुभवों पर आधारित होती है मगर वह ऐसा अनुभव होती है जिसमें कलाकार का दृढ़ विश्वास, कलाकार की ‘उद्दंडता’ युग के सामान्यीकरण को व्यक्त करती है. जब दोस्तोयेव्स्की निकोलाई स्ताव्रोगिन की सृष्टि कर रहे थे, उस बौद्धिक दिवालिये की, जिसका कोई देश नहीं, कोई निष्ठां नहीं, उस प्रतिरूप की जिसे पचास वर्ष बाद सर्वोच्च सोवियत न्यायालय के सामने गद्दार, दुष्ट और गुप्तचर की हैसियत से पेश होना था, तो दोस्तोयेव्स्की ने(मुझे इसका पक्का विश्वास है) अपने आंतरिक दृढ़ विश्वास की तुलना में अपने नोटबुकों पर कम निर्भर किया था.

मैं कदापि यह नहीं कह रहा हूँ कि जीवन का प्रेक्षण करने, या नोटबुक इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है. मैं केवल यह कह रहा हूँ कि आपको प्रेक्षण अन्तर्ग्रस्त हुए बिना नहीं करना चाहिये, केवल तथ्यों का इन्द्राज नहीं करना चाहिये, बल्कि जीवन में अपने सामान्यीकरण के प्रतिरूपों की तलाश करनी चाहिये.

आप पूछते हैं कि जब आप किसी को देखते हैं तो किस आधार पर यह तय करते हैं कि यह व्यक्ति युग के प्रतिरूप के लिए सामग्री का काम दे सकता है. ईमानदारी की बात यह है कि मैं नहीं जनता हूँ. आप गलती भी कर सकते हैं. परन्तु हिम्मत मत हारिये. कलाकार के मानसिक, बौद्धिक और भावात्मक उपकरण का विश्लेषण करना अभी बाकी है, जो एक दिन किया जायेगा. साहस रखिये और अपने पर विश्वास कीजिये. आपको स्वयं अपने पर्यवेक्षणों और संवेदनाओं से लगने लगता है कि आप युग के प्रतिरूप की रचना कर रहे हैं. और अगर उसकी रचना करने में आप मिथ्या वर्णन न करें, वस्तुओं का अयथार्थ रूप न प्रस्तुत करें, अगर आप धरती से ऊपर उठ सकें तो सौ में से निन्यानवे सूरतों में आपको कलात्मक सफलता मिलेगी.

परन्तु अगर आप पिटे-पिटाये रास्तों पर, लस्टम-पस्टम, बनावटी कहकहा लगाते और मुस्कुराते हुए, ढीले-ढाले अंदाज में चलें, जब स्थिति बहुत कठिन होने लगे तो हिम्मत हारने लगें, जमीन पर कान लगाए रहें, आदि, तो यह कला नहीं है, बनियापन है, घटिया, निरा बनियापन.

कलाकार को निर्भीक सोवियत युग की महान धारणाओं से प्रेरित होना चाहिए. अगर गल्तियाँ मुंह फाड़े खड़ी हैं तो उसे गलती करने दीजिये. एक महान कृति के निर्माण की प्रक्रिया में गल्तियाँ एक आवश्यक कलात्मक अनुभव हैं. हम सबों के लिए जरूरी है कि अपने भीतर साहस को बटोरे रखें और पाले पोसें….

केवल उस जनगण का साहित्य जो समाजवाद का निर्माण कर रहा है उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है. हमारे क्रांतिकारी युग के साहसपूरण कारनामों की गूँज साहित्य में कला के साहस के रूप में सुनाई देनी चाहिए. और उनकी गूँज निस्संदेह सुनाई देगी क्यूंकि हमारे देश में लेखकों से जनगण प्यार करते हैं और पाटीँ तथा सरकार उनका ध्यान रखती है. हर साल सोवियत संघ में रहने वाली जातियों का साहित्य विकास की नई मंजिलें तय कर रहा है. यह अकारण ही नहीं है कि जिन लेखकों को सम्माननीय पदक प्रदान किए गए हैं, उनमें हमें अनेक जातियों के प्रतिनिधि मिलते हैं…..

हमें अपनी सृजनात्मक शक्तिओं को बेड़ियाँ काटकर आज़ाद कर देना चाहिए. हमारे पास इसकी समस्त भौतिक तथा बौद्धिक संभावनाएं मौजूद हैं. हमारे पास जो भी प्रतिभा हो उसे विकसित करना चाहिए और वह छुपे हुए पन्ने पर अपना उचित स्थान पायेगी.

आप लेखकों में जो लिखना शुरू कर रहे हैं, ऐसे भी होंगे जिन्हें अपने से पुराने एक लेखक की जीवन यात्रा में दिलचस्पी हो.

जब मैं पन्द्रह या सोलह वर्ष का था तो मैनें कवितायें लिखनी शुरू की. बुरी कवितायें. १९०५ की क्रांति के दौरान मैंने क्रांतिकारी गीत लिखे, और उनमें भी कोई ख़ास बात नहीं थी. उस समय तक मैंने लेखन को अपना जीवन लक्ष्य बनाने की बात नहीं सोची थी.

परन्तु मुझे सृजनात्मक प्रिक्रिया की मूल बातों ने सदा आकर्षित किया था. यहाँ एक कापी, कलम और दावात है. कुछ सम्भव है, कुछ जो बस यहाँ नजदीक ही है, मगर अभी हाथ नहीं आ रहा है. आपने अपनी संवेदनाओं, संस्मरणों, और विचारों को शब्दों में ढालना शुरू ही किया था, कि कागज पर आते आते वह सब हवा हो जाता है.

बहुत दिनों तक ऐसा ही चलता रहा. एक साल गर्मियों में क्रीमिया में कोई एक कवि फ़्रांसीसी से अपने गद्य अनुवाद पढ़कर सुना रहा था. मैं प्रतिमाओं की सजीवता और स्पष्टता से प्रभावित हुआ. यकायक मेरी इच्छा हुई कि जो कुछ सुना है, उसका अनुकरण करूँ. मैनें अनुकरण से प्रारम्भ किया, यानि अब मेरे सामने एक नमूना था, एक रास्ता जिसकी ओर मैं अपनी सृजनात्मक शक्तिओं को लगा सकता था. परन्तु उस समय वह मेरा मार्ग नहीं किसी और का था.

मेरी संवेदनाओं, संस्मरणों और विचारों की लहरें इस दिशा में बढती रहीं. छह महीने बाद मुझे स्वयं एक विषय मिल गया- मेरी माँ और मेरे सम्बन्धियों की कहानियाँ, अभिजात वर्ग के उन लोगों के बारे में जो विनाश का शिकार होकर मिट चुके थे या मिटते जा रहे थे. सनकियों की दुनिया, रंगीन और अर्थहीन. १९०९ और १९१० में, युद्ध के पूर्व, बढ़े आते पूँजीवाद की पृष्ठभूमि में, जब रूस तेजी से एक अर्द्ध- औपनिवेशिक शक्ति बनता जा रहा था, निकट अतीत के ये सनकी भूदास युग के प्रतिरूपों की हैसियत से मेरे सामने उठ खड़े हुए. यह एक कलात्मक उपलब्धि थी.

साभार- परिकल्पना प्रकाशन

अगले अंक में जारी……..

” मैं जानता हूँ कि उसे यह सीखना होगा कि सभी आदमी ईमानदार नहीं होते ओर सभी सच्चे नहीं  होते, लेकिन उसे यह भी सिखाइए, कि जितने दुष्ट हैं, उतने लायक भी हैं; कि जितने स्वार्थी राजनीतिज्ञ हैं, उतने समर्पित नेता हैं…उसे यह भी सिखाइए कि यदि दुश्मन हैं; तो उतने ही दोस्त भी हैं. मुझे मालूम है, इसमें समय लगेगा; पर यदि आप कर सकें तो उसे यह भी सिखाइए कि ख़ुद अर्जित एक डॉलर की कीमत कहीं से मिल गए पॉँच डॉलरों से ज्यादा होती है. उसे बताइए कि वह हार को स्वीकार करना सीखें.. और जीत का आनंद लेना भी. उसे ईर्ष्या से दूर ले जाइए, यदि आप ऐसा कर सके, और उसे मृदु हास्य के रहस्य से परिचित कराइए. उसे कम उम्र में ही यह सिखाइए कि बदमाशों को पीटना सबसे आसान होता है. उसे पुस्तकों की अदभुत दुनिया के बारे में बताइए, लेकिन उसे आकाश में उड़ते पक्षिओं, धुप में फिरती मधुमक्खियों और हरी पहाडियों पर खिले फूलों के शाश्वत रहस्य पर दिमाग दौड़ने के लिए भी तो समय दीजिए.

स्कूल में उसे यह सिखाइए कि असफल होना बेईमानी करने से कहीं ज्यादा सम्मानजनक है. उसे अपने ख़ुद के विचारों में आस्था रखना सिखाइए भले ही हर कोई कह रहा हो कि वे ग़लत हैं….उसे नम्र लोगों के साथ नम्रता से तथा कठोर लोगों से कठोरता से पेश आना सिखाइए और मेरे बच्चे को ऐसी मजबूती देने की कोशिश कीजिए कि जब हर कोई सफलता के पीछे भाग रहा हो, तब भी वह भीड़ के पीछे ना चलें. उसे सिखाइए कि वह सबकी बात सुनें..  उसे सच्चाई के छन्ने से छाने  और जो अच्छाई हो, उसे ग्रहण करे.

उसे उदासी में भी हँसाना सिखाइए. उसे इंसानी गुणों से द्वेष करने वाले पर हँसना सिखाइए और बहुत ज्यादा मिठास से सावधान रहना सिखाइए. उसे सिखाइए कि वह अपने बल और बुद्धि का अधिकतम मूल्य लगाये पर कभी भी अपने हृदय और आत्मा की कीमत न लगाये. उसे यह भी सिखाइए कि अगर वह समझता है कि वह सही है तो चीखती-चिल्लाती भीड़ पर ध्यान न दे और दृढ़ता से लड़ाई लड़े.

उसके साथ नम्रता से पेश आयें. मगर उसे दुलराएँ नहीं क्योंकि अग्नि परीक्षा से गुज़र कर ही असली फौलाद तैयार होता है. उसे अधीर होने का साहस करने दीजिए…. और उसे साहसी होने का धीरज भी सिखाइए. उसे हमेशा अपने में आस्था रखना सिखाइए, क्योंकि तभी वह मानव जाती में उदात आस्था रख सकेगा.
—अब्राहम लिंकन का हेडमास्टर के नाम पत्र

आजकल ज्ञान अर्थव्यवस्था(नोलेज इकनोमी बूम)में आ रही ”तेजी” का खूब राग गाया जा रहा है. बहुत ही ज्यादा हो-हल्ले और हर्शोल्ल्लास के साथ इस बात का ऐलान किया जाता है की सूचना प्रोद्योगिकी क्षेत्र(आई. टी.)में लगातार रोजगार के नए-नए अवसर पैदा हो रहे हैं. यही नहीं बेरोजगारी के लगातार कम होने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं. केवल सरकार ही नहीं बल्कि दो कौडी के बाजारू अखबार व पत्रिकाएं भी लोगों के सामने भ्रामक ”गुलाबी” तस्वीर पेश कर रहीं हैं.

आइये जरा देखा जाए कि सरकार के इन बड़े-बड़े दावों में कितनी सच्चाई है! बंगलूर को सूचना प्रौद्योगिकी का केन्द्र माना जाता है. अभी हाल ही में यहाँ किए गए नमूना सर्वेक्षण के जारी कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन पर गौर करना दिलचस्प होगा. अक्सर ऐसा कहा जाता है कि सूचना-प्रौद्योगिकी समाज के एक व्यापक हिस्से को रोज़गार दिला पाने में सक्षम है. इस सर्वेक्षण से यह बात सामने आ गई है कि अक्सर जिन रोजगारों के बूते नोलेज इकनोमी बूम का साज़ छेडा गया है वह रोज़गार इस देश के कितने नौजवानों को नसीब हो पा रहा है.

समाज में शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच का मतभेद अत्यन्त गहरा है. शारीरिक श्रम के प्रति घृणा का भाव और उसे कम करके आंकने की हमारी मानसिकता बहुत लंबे समय से हमारे दिलो-दिमाग में रचे-बसे हैं. इसलिए हम लोगों का झुकाव प्राय: ऐसे कामों की तरफ़ होता है जिनमें मानसिक पहलू ज्यादा होता है. यही कारण है कि सूचना प्रौद्योगिकी में पैदा हो रहे रोजगारों से हमें उम्मीद बनती दिखाई देती है. इसलिए आम घरों से आए छात्र-छात्राएं भी इन रोजगारों में अपनी जगह बना पाए, इसके लिए वे हर मुमकिन कोशिश में जुट जाते हैं.

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र के भीतर भी वर्ग पदानुक्रम प्रत्यक्ष रूप में  देखने को मिलता है. यहाँ भी अलग-अलग पदों के लिए लोग नियुक्त किए जाते हैं (जैसे कि एग्जीक्यूटिव, मैनेज़र, एसोसिएट्स, इंजिनियर, चपरासी आदि). कामों में किया गया यह विभाजन किसी भी व्यक्ति विशेष की शैक्षणिक पृष्ठभूमि ( जो कि असल में उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से जुडी होती है) के आधार पर तय किया जाता है. खैर, यह चर्चा एक अलग लेख की मांग करता है जिसपर किसी और दिन तफसील से बात की जा सकती है. फिलहाल हम मुद्दे पर वापस आते हैं.

इस नमूना सर्वेक्षण के दौरान पता चला के सर्वेक्षण के तहत आए कुल सॉफ्टवेयर पेशेवर (सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल) में से अस्सी प्रतिशत के पिता ग्रेजुएट हैं. इन कम्पनियों में काम कर रहे लोगों में केवल २.२ फीसदी ऐसे थे जिनके पिता कि शिक्षा बारहवीं या उससे कम थी. छप्पन फीसदी की माताएं या तो ग्रेजुएट थीं या उससे भी अधिक शिक्षित थीं. इससे साफ़ मालूम होता है  की सूचना प्रौद्योगिकी की कम्पनियों में ज्यादातर वे लोग ही अपनी जगह बना पते हैं जिनके परिवार जनों ने अच्छी शिक्षा प्राप्त की है. इनमें चौरासी फीसदी के पिता ऐसे व्यवसायों में लगे थे जिन्हें उच्च मध्यमवर्गीय व्यवसायों की श्रेणी में गिना जाता है. इक्कीस फीसदी और दस फीसदी के पिता पब्लिक व प्राइवेट सेक्टर की कम्पनियों में क्रमश: मैनेज़र और एक्जीक्यूटिव के पद पर काम कर रहे थे, अठारह  फीसदी के पिता या तो डॉक्टर या फ़िर प्रोफेसरी जैसे पेशों से सम्बन्ध रखते थे, तेरह फीसदी के पिता व्यापर जगत से जुड़े थे. इनमें से केवल नौ फीसदी के पिता छोटे दर्जे के व्यवसायों से जुड़े थे और तीन फीसदी के पिता खेतीबाड़ी का काम कर रहे थे. इससे एक बात स्पष्ट होती है कि सूचना प्रौद्योगिकी में काम करने वाली अधिकतम आबादी खाते-पीते मध्यमवर्गीय परिवारों से आती है जिनका जीवन सुविधा संपन्न होता है और जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के बारे में उन्हें कोई चिंता नहीं होती है.

सर्वेक्षण के अन्य पहलुओं पर अगर एक सरसरी नज़र दौड़ाई जाए तो समझ में आता है कि सूचना प्रौद्योगिकी में काम करने वाले लोग जिनका अध्ययन किया गया है उसमें से 36 फ़ीसदी का जन्म दूसरे दर्जे के शहरों में  हुआ; 29 फ़ीसदी का जन्म किसी न किसी मेट्रो शहर में हुआ है (जैसे मैसूर और पुणे) और 31 फ़ीसदी का जन्म तीसरे दर्जे के शहरों में हुआ था, कम्पनियों में काम करने वाले लोगों में से 5 फ़ीसदी ईसाई हैं, 2 फ़ीसदी हिस्सा मुसलमानों का है. इस परिघटना को भी वर्ग दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत है क्योंकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अल्पसंख्यकों का अधिकतम  हिस्सा गरीबी और बदहाली से गुज़र कर रहा है और अल्पसंख्यकों का जो छोटा-सा हिस्सा ऐसी कंपनियों में नौकरी पाने में समक्ष है, वह खाते-पीते घरों से आता है.

वैसे तो इस पूरी परिघटना को व्यापक परिपेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है क्योकि इन कंपनियों में जो लोग जगह बनाते हैं वे मुख्यत: इंजीनियरिंग छात्र-छात्राएं होते हैं. और यह बात किसी से छुपी नहीं है कि इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिला पाने वाले छात्र मुख्यत: उच्च मध्यवर्गीय प्रष्ठभूमि से आते हैं जिनके परिवारजनों के पास इतने आर्थिक संसाधन होते हैं कि वे अपने बच्चों को उच्च और महँगी शिक्षा दिला पाएं. ज्यादातर कालेजों की सालाना फीस 40,000 से 50,000 रुपये के बीच होती है. यही नहीं, इन कालेजों में दाखिले के लिए जो प्रवेश परीक्षा होती है, उसकी तैयारी कराने के लिए तरह-तरह के कोचिंग सेंटर आज मैदान में उतरकर छत्रों को लुभाने में जुटे हुए हैं. इन कोचिंग सेंटरों की फीस भी कुछ कम नहीं होती, (सालाना तकरीबन 20,000 रुपये). ऐसे हालात में क्या आम घर से आए हुए छात्रों के लिए इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिला पाना मुमकिन है? इसलिए एक बहुत बड़ी आबादी तो पहले ही इन कालेजों में पहुँचने में असमर्थ है. वे पहले ही अपनी सामाजिक-आर्थिक प्रष्ठभूमि की वजह से दरकिनार कर दिए जाते हैं. इसके बावजूद आम घरों से आने वाली एक छोटी सी आबादी जो किसी तरह से इन कालेजों तक अपनी पहुँच बनाती है, उसे भी देर-सवेर इन कंपनियों से दूर खदेड़ दिया जाता है. इन कंपनियों में भरती की प्रक्रिया को अत्यन्त जटिल बना दिया गया है ताकि साधारण प्रष्ठभूमि के छात्र वहां तक न पहुँच पाएं!

आइए ज़रा एक बार सॉफ्टवेयर कम्पनियों में भर्ती (कैम्पस पैलेसमेंट) की प्रक्रिया पर नज़र डाल ली जाए. ज्यादातर आई.टी.कंपनियों केवल देश के बेहतरीन माने जाने वाले कालेजों में ही जाती हैं (जिन्हें रैंकों के आधार पर बांटा गया है). अब ख़ुद सोचिये की ऐसे कालेजों में पढ़ने वाले छात्र कौन से होते हैं? केवल वहीं विधार्थी कैम्पस प्लेसमेंट में हिस्सा ले सकते हैं जो कंपनियों द्वारा निर्धारित की हुई न्यूनतम मानक (साधारणत: कोर्स के दौरान 70 फीसदी अंक) को पूरा कर पाते हैं. यह शर्त निम्न जाती, ग्रामीण एवं कामकाजी परिवारों के छात्रों को बाहर कर देती है क्योंकि उनकी शिक्षा ज्यादातर सरकारी या फ़िर देसी स्कूलों में होती है. और इन स्कूलों में शिक्षा का स्तर कैसा होता है, इसे बताने की ज़रूरत नहीं है. आम परिवारों के छात्रों के पास इतने आर्थिक साधन ही नहीं होते कि वे “अच्छे” कहे जाने वाले स्कूलों में दाखिला ले पायें और महँगी फीस जमा करवा पाएं. नतीज़तन, होता यह है कि वे अच्छे अंक ला पाने में असमर्थ रहते हैं. खैर, इन सबके बावजूद जो थोड़े-बहुत छात्र किसी तरह से कालजों में दाखिले के बाद अच्छे अंक ला पाते हैं, और प्लेसमेंट प्रक्रिया के पहले पायदान पर कदम रख देते हैं, उनकी छंटनी तो सामूहिक चर्चा (ग्रुप डिस्कशन) और इंटरव्यू के दौरान हो जाती हैं. सामूहिक चर्चा से कंपनियों इस बात का अंदाजा लगाती हैं कि आपकी संप्रेषण  क्षमता (कम्युनिकेशन स्किल्स) कितनी बेहतर है, कि आपका व्यक्तित्व उनकी कंपनी की “संस्कृति” में जगह बनाने लायक है या नहीं. इसके पश्चात् इंटरव्यू की प्रक्रिया को चरणों में बान्टा गया है– एक तकनीकी (टेक्नीकल) इंटरव्यू और दूसरा एच. आर. (ह्युमन रिसोर्स) इंटरव्यू. एच.आर. इंटरव्यू में यह देखा जाता है कि आपकी अंग्रेज़ी पर पकड़ कैसी है, और गलती से अगर अंग्रेज़ी बोल पाने में आपको थोडी दिक्कत का सामना करना पड़ता है तो समझ लीजिए कि इन कंपनियों में आपके लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि आपका अंग्रेज़ी न बोल पाना कंपनी के लिए “अपमान” का कारण बन सकता है. जाहिरा तौर पर अपनी पिछड़ी और गरीब प्रष्ठभूमि की वजह से छात्रों का थोड़ा-सा हिस्सा किसी तरह से अपनी पैठ बनने की कोशिश में लगा रहता है, वह भी पीछे धकेल दिया जाता है.

कभी-कभी निश्चित तौर पर ऐसे भी अपवाद होते हैं जो अपनी गरीब प्रष्ठभूमि के बावजूद उच्च शिक्षा संस्थानों तक अपनी पहुँच बना पाते हैं , पर इन अपवादों की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है. गौरतलब बात यह है कि नौजवानों का केवल 7 प्रतिशत हिस्सा ही उच्च शिक्षा पाने की हैसियत रखता है. इनमें से केवल 0.1 प्रतिशत या 0.2 लोग ऐसे हैं जो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नौकरी पाते हैं और रोज़गार पाने वाली इतनी छोटी आबादी के बूते ज्ञान अर्थव्यवस्था में आ रही तेज़ी की बड़ी-बड़ी हवाई बातें की जा रही हैं.

असल में ज़मीनी हकीकत तो यह है कि इस व्यवस्था का मकसद सब को रोज़गार देना है ही नहीं. इसलिए शिक्षा को लगातार महंगा किया जा रहा है ताकि एक व्यापक हिस्से पहले ही कालेजों में आने से रोका जाए. यूँ तो अर्थव्यवस्था के बढ़ते वृद्धि दर का भोंपू लगातार बजाय जा रहा है पर अब तो सरकार भी बड़ी बेशर्मी से यह कहती है जो विकास हो रहा है “रोजगारविहीन विकास” है. अब यह सरकार के ज़िम्मेदारी नहीं है कि वह सबको रोज़गार मुहैया कराए. इसलिए जल्द से जल्द इस बात को समझने की ज़रूरत है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिला हो पाने के बावजूद आम-घरों के लड़के-लड़कियों को रोज़गार मिलने की गारंटी नहीं है. क्योंकि ये रोज़गार के अवसर उस “कुलीन” मध्यम वर्ग के लिए हैं जिनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है. वैसे भी पूंजीवादी व्यवस्था में तो हर चीज़ माल की तरह बेचीं जाती है, इसलिए शिक्षा भी माल का रूप अपना लेती है–यानि जिसकी औकात हो, वो आकर ख़रीदे उसे! और जो खरीद नहीं सकता वह जिंदगी भर सड़कों पर चप्पले फटकाता फिरे! इसलिए साधारण परिवेश से आए छात्र जो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना सुरक्षित भविष्य तलाश रहे हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि इस क्षेत्र में बढ़ते रोज़गार का जो धूम्रावरण  खड़ा किया गया है, उसे हटाकर सच्चाई पहचानने की कोशिश करें.

–आह्वान जनवरी-मार्च २००८ से साभार .

ऐ रहबरे-मुल्को-कौम बता

आँखें तो उठा नज़रें तो मिला

कुछ हम भी सुने हमको भी बता

ये किसका लहू है कौन मरा…


धरती की सुलगती छाती पर

बेचैन शरारे पूछते हैं

हम लोग जिन्हें अपना न सके

वे खून के धारे पूछते हैं

सड़कों की जुबां चिल्लाती है

सागर के किनारे पूछते है|

ये किसका लहू है कौन मरा…


ऐ अज़्मे-फना देने वालो

पैगामे-वफ़ा देने वालो

अब आग से क्यूँ कतराते हो

मौजों को हवा देने वालो

तूफ़ान से अब क्यूँ डरते हो

शोलों को हवा देने वालो

क्या भूल गए अपना नारा

ये किसका लहू है कौन मरा


हम ठान चुके हैं अब जी में

हर जालिम से टकरायेंगे

तुम समझौते की आस रखो

हम आगे बढ़ते जायेंगे

हम मंजिले-आज़ादी की कसम

हर मंजिल पे दोहराएँगे

ये किसका लहू है कौन मरा…

–साहिर लुधियानवी
(1946 के नौसेना विद्रोह के समय लिखी नज़्म)

आ रे नौजवान
आ रे नौजवान तेरी बेड़ियाँ रही हैं टूट
क्रांति का नया कदम बढ़ा
क्रांति का नया कदम बढ़ा

बढ़ रहा है आज तेरा कारवाँ
सर झुका रहा जमीन को आसमां
राह की सफों को तूने कर लिया है पार
सामने की मंजिलें रहीं तुझे पुकार
उठ गुलाम उठ गुलाम
उठ गुलाम जिंदगी के बंधनों को तोड़ दे

चल सुबह की रौशनी में डगमगाना छोड़ दे| आ रे नौजवान…

अब सुना न जुल्म की कहानियां

दांव पर लगा दे नौजवानियाँ

ख़त्म हो चली हैं ऐशो-हुक्मारानियाँ

ख़त्म हो चली हैं ये वीरानियाँ

उठ गुलाम उठ गुलाम

उठ गुलाम जिंदगी के बंधनों को तोड़ दे

चल सुबह की रौशनी में डगमगाना छोड़ दे| आ रे नौजवान…

इप्टा

मक्सिम गोर्की

समुद्र की रुपहली सतह के ऊपर हवा के झोंके तूफ़ान के बादलों की सेना जमा कर रहे हैं और बादलों तथा समुद्र के बीच तूफ़ानी पितरेल चक्कर लगा रहा है–गौरव और गरीमा के साथ, अंधकार को चीरकर कौंध जाने वाली बिजली की रेखा की भांति!
कभी वह नीचे उतर आता है–इतना की लहरें उसके पंखों को दुलारती हैं, फ़िर तेज़ी के साथ ऊँचे उठ जाता है–तीर की भांति बादलों को चीरता और अपनी भयानक चीख़ से आकाश को गुंजाता, और बादल –उसकी इस साहसपूर्ण चीख़ में चरम आनंदातिरेक का अनुभव कर–थरथरा उठते!
उसकी इस चीख़ में तूफ़ान से टकराने की एक हूक ध्वनित  होती! उसके आवेश और आवेगों की, उसके गुस्से और जीत में उसके विश्वास की लपक ध्वनित होती!
समुद्री गल पक्षी भय से चिचिया उठते,–चिचियाते-करहाते पानी की सतह पर छितर जाते और डर के मारे समुद्र की स्याह गहराइयों में समां जाने के लिए उतावले हो उठते!
और ग्रेब पक्षी भी विलाप करने लगते! संघर्ष के चर्म आह्लाद को– जो सभी संज्ञाओं  से परे है–वे क्या जाने? बिजली की गरज और बादलों की गड़गडाहट उनकी जान सोख लेती!
और बुद्धू पेंगुइन चट्टानों की दरारों में गर्दनें डाल समझते हैं कि मुक्ति मिल गई! एक अकेला तूफ़ानी पितरेल पक्षी ही है जो समुद्र के ऊपर, रुपहले झाग उगलती फनफनाती लहरों के ऊपर, मंडरा रहा है!
और तूफ़ान के बादल समुद्र के सतह पर घिरते आ रहे हैं–अधिकाधिक नीचे, अधिकाधिक काले–और गीत गाती तथा छलछलाती लहरें–गरज और गड़गडाहट से गले मिलने की उमंगों से भरी–ऊँची उठती रहीं हैं–ऊँची उठती जा रही हैं!
बिजली कड़कती और दमामा बजता है. समुद्र की लहरें हवा के झोकों के विरुद्ध भयानक युद्ध में कूद पड़ती हैं और हवा के झोंके–उन्हें अपने लौह आलिंगन में जकड़–इस समूची मरकत राशिः को चट्टानों पर दे मारते हैं–और उनका एक-एक कण छितरा जाता है!
तूफ़ानी पितरेल पक्षी–अंधकार को चीरकर कौंध जाने वाली बिजली की रेखा की भांति–तीर की तरह तूफ़ान के बादलों को बींधता, तेज़ धार की भांति पानी को भीतर से काटता चक्कर लगा रहा हैं और अपनी चीख़ से आकाश गूंजा रहा है!
दानव की भांति–सदा अट्टहास करते और सुबकते तूफ़ान के काले दानव की भांति–वह निर्बाध मंडरा रहा है–तूफ़ान के बादलों पर अट्टहास करता, आनंदातिरेक से सुबकता!
बिजली की गरज में थकान की भनभनाहट वह सुनता है. इस दानव की बुद्धि से वह छिपी नहीं रहती. उसका विश्वास है कि बादल सूरज की सत्ता को कभी नहीं मिटा सकेंगे!
समुद्र गरजता हैं….बिजली कड़कती है…
समुद्र के व्यापक विस्तार के ऊपर तूफ़ान के बादलों में नीली बिजली कौंधती है, लहरें उछलकर विद्धुत अग्नि-बाणों को लपकती और उन्हें ठंडा कर देती हैं और उनके सर्पिल प्रतिबिम्ब, बल खाते और बुझते, समुद्र की गहराइयों में समा जाते है.
तूफ़ान! शीघ्र ही तूफ़ान टूट पड़ेगा!
लेकिन तूफ़ानी पितरेल पक्षी है कि अभी भी–गौरव और गरीमा से भरा–बिजली की कड़क और बादलों के बीच और गरजते चिंग्घाड़ते समुद्र के ऊपर मंडरा रहा है और उसकी चीख़ में चरम आह्लाद की ध्वनी है–विजय की भविष्यवाणी की भांति…

आए तूफ़ान, अपने पूरे गुस्से के साथ आए!

कठिनाइयों से रीता जीवन

मेरे लिए नहीं,

नहीं, मेरे तूफानी मन को यह स्वीकार नहीं |

मुझे तो चाहिए एक महान ऊँचा लक्ष्य

और, उसके लिए उम्रभर संघर्षों का अटूट क्रम |

ओ कला ! तू खोल

मानवता की धरोहर, अपने अमूल्य कोषों के द्वार

मेरे लिए खोल !

अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में

अखिल विश्व को बाँध लूँगा मैं !

आओ,

हम बीहड़ और कठिन सुदूर यात्रा पर चलें

आओ, क्योंकि-

छिछला, निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन जीवन

हमें स्वीकार नहीं !

हम, उंघते, कलम घिसते हुए

उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे |

हम–आकांक्षा, आक्रोश, आवेग और

अभिमान में जियेंगे !

असली इन्सान की तरह जियेंगे |

--कार्ल मार्क्स

ਧੂੜ ਦੀ ਥਾਂ ਰਾਖ ਹੋਣਾ ਚਾਹਾਂਗਾ ਮੈਂ

ਮੈਂ ਚਾਹਾਂਗਾ ਕਿ ਇਕ ਅਮਿੱਟ ਜਵਾਲਾ ਬਣ ਜਾਏ

ਭੜਕ ਕੇ ਮੇਰੀ ਚਿੰਗਾਰੀ

ਬਜਾਏ ਇਸਦੇ ਕਿ ੜੇ ਕਾਠ ਵਿੱਚ ਉਸਦਾ ਦਮ

ਘੁੱਟ ਜਾਏ |
ਇੱਕ ਉਂਘਦੇ ਹੋਏ
ਥਾਈ ਗ੍ਰਹਿ ਦੀ ਬਜਾਏ

ਮੈਂ ਹੋਣਾ ਚਾਹਾਂਗਾ ਇੱਕ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਉਲਕਾ
ਮੇਰਾ ਹਰ ਇੱਕ ਅਣੂ ਜਗਮਗਾਏ ਸ਼ਾਨ ਦੇ ਨਾਲ |
ਮਨੁੱਖ ਦਾ ਸਹੀ ਕੱਮ ਹੈ ਜੀਣਾ, ਨਾ ਕਿ ਸਿਰਫ

ਜਿਉਂਦੇ ਰਹਿਣਾ
ਆਪਣੇ ਦਿਨ ਮੈਂ ਬਰਬਾਦ ਨਹੀਂ ਕਰਾਂਗਾ, ਉਹਨਾਂ
ਨੂੰ ਲੰਬਾ ਬਣਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਵਿਚ
ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਸਮੇਂ ਦਾ ਇਸਤੇਮਾਲ ਕਰਾਂਗਾ |

ਜੈਕ ਲੰਡਨ